न्यूज़ डेस्क: इस वर्ष श्री गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस घोषणा के साथ और भी विशिष्ट हो गया कि तीन कृषि कानूनों को निरस्त कर दिया जाएगा तथा करतारपुर साहिब कॉरिडोर को फिर से खोल दिया जाएगा। कोई भी राष्ट्रवादी, कोई भी व्यक्ति जो हमारे किसान और कृषि क्षेत्र के कल्याण के बारे में सोचते हैं, इस घोषणा का स्वागत करेंगे। इसी के साथ पिछले कुछ महीनों में हुई उथल-पुथल वाली घटनाओं की भी समाप्ति हो गयी है, जिसने हम सभी को बहुत व्यथित किया था। मैं एक बार फिर उन किसानों को शुक्रिया कहना चाहता हूं, जिन्होंने बहुत साहस का परिचय दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी के फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे जनता की राय पर ध्यान देते हैं। अपने संबोधन में उन्होंने किसानों के लिए उनकी सरकार द्वारा उठाए गए कई कदमों के बारे में बताया। यह किसी शर्त के साथ या चरणबद्ध वापसी नहीं थी, पीएम ने दृढ़ निर्णय लिया है। तथ्य यह कि प्रधानमंत्री ने स्वयं इसकी घोषणा की है – इस बात को लोग जरूर याद रखेंगे। किसी और के द्वारा घोषणा करवाना या संसद के पटल पर इसकी घोषणा करना आसान था। फिर भी, जीत या हार के किसी राजनीतिक सोच-विचार के बिना यह घोषणा की गयी। प्रधानमंत्री के फैसले को “पीछे हटने” या “कमजोरी” के रूप में देखना भी सही नहीं है। लोकतंत्र में लोगों की इच्छा को सुनने-समझने से बड़ा कुछ नहीं होता और ऐसा करने वाले व्यक्ति से बड़ा कोई लोकतांत्रिक राजनेता नहीं होता।
एक सैनिक के रूप में, जिसे वर्षों से हमारी मातृभूमि की सेवा करने का सम्मान मिला है, मैं इस कदम का स्वागत करता हूं। संबंधों के बीच कटुता दिनोंदिन और तीखी होती जा रही थी। एक छोटी सी घटना होने पर भी लोग एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे थे, नीयत पर टिप्पणी कर रहे थे या राष्ट्र के प्रति लोगों की वफादारी पर सवाल उठा रहे थे। इनमें से कोई भी बात राष्ट्र की प्रगति के लिए अच्छी नहीं है। विदेशों में, यह उन लोगों के लिए एक मुद्दा बन गया, जो भारत की एकता को नष्ट करना चाहते हैं। पाकिस्तान जैसे राष्ट्रों ने, जिन्होंने हमें युद्ध के मैदान में कभी पराजित नहीं किया, हमारे स्वाभिमानी और देशभक्त किसानों का उपयोग करके छद्म लड़ाई के लिए अपनी रणनीति तैयार की थी। प्रधानमंत्री की इस एक घोषणा ने उनके आधे-अधूरे सपनों को नष्ट कर दिया।
व्यापक स्तर पर, यह राजनीति करने का अवसर नहीं है। कम से कम किसानों से जुड़े मुद्दों पर तो बिल्कुल भी नहीं। हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। ये हमारे किसान ही हैं, जो देश के लोगों का पेट भरते हैं। इसी तरह, मैं सभी से आग्रह करता हूं कि वे सिख धर्म का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए न करें। 1980 के दशक की यादें और घाव हर किसी के सामने हैं। अगर कोई इन मुद्दों पर राजनीति करेगा, तो जनता उन्हें सबक सिखाएगी।
गुरु साहिबों की शिक्षाओं से प्रभावित एक सच्चाक सिख होने के नाते, प्रधानमंत्री की घोषणाओं ने मुझे भाव विह्वल कर दिया है। किसी भी सिख ने इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया है कि कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा एक शुभ दिन के मौके पर हुई। प्रधानमंत्री ने गुरु नानक देव जी और गुरु गोबिंद सिंह जी का हवाला दिया। उन्होंने अपने संबोधन में ‘क्षमा भाव’ शब्द का प्रयोग किया। यह साफ है कि वो सिख समुदाय के साथ एक रिश्ता बनाना चाहते हैं। इस घोषणा से कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री ने श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर कॉरिडोर खोलने का निर्णय लिया। पिछले साल, उन्होंने दिल्ली के दो गुरुद्वारों में मत्था टेका। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अफगानिस्तान से लौट आने और उसे इस देश में एक विशेष सम्मान मिलने पर किस सिख ने खुशी महसूस नहीं की।
भारत के सिख निष्ठावान देशभक्त हैं। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मुगलों और अंग्रेजों से जमकर लड़ाइयां लड़ी हैं। इस देश में सिख राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री, सेना प्रमुख, शीर्ष उद्योगपति, अभिनेता, कलाकार बने हैं और उन्होंने कई क्षेत्रों में अपार सफलताएं हासिल की हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में सिख युवाओं को स्नेह और भाईचारे का संदेश दिया है। मैंने हमेशा कहा है कि एक सीमावर्ती राज्य होने के नाते पंजाब को बेहद संवेदनशीलता के साथ संभालने की जरूरत है और मुझे खुशी है कि ऐसा किया जा रहा है।साथ ही, मुझे आशा है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में जिहादी मानसिकता की वजह से सिखों (और अन्य अल्पसंख्यकों) की दयनीय स्थिति पर भी हम गौर करेंगे।







