न्यूज़ डेस्क: हार के हाल के सियासी घटनाक्रम के बाद बुधवार सुबह से राजद और दूसरे दलों के नेताओं या उनसे जुड़े लोगों के यहां सीबीआई की ताबड़तोड़ छापेमारी के बीच ही विधानसभा में नवगठित नीतीश कुमार सरकार अपना विश्वासमत हासिल करती दिखी।
नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद बुधवार को बिहार विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया। मकसद तो नए स्पीकर का चुनाव कराना था, लेकिन जरूरत न होते हुए भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सदन में विश्वास प्रस्ताव लाकर बहुमत साबित कर दिया। जबकि 164 विधायक उनके पक्ष में पहले से ही थे।
इस दौरान भाषणबाजी भी खूब हुई। तेजस्वी यादव ने खुद को असली समाजवादी बताया तो नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होने पर अपनी सफाई देते हुए अटल- आडवाणी को याद किया। विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं के फोन आने की बात कह कर उन्होंने भविष्य की अपनी सियासी भूमिका का भी संकेत दिया। सीबीआई के छापों के बीच इतनी बेफिक्री से राजद-जदयू का विधानसभा में व्यस्त रहना, पूरे दिन हर किसी को ‘कन्फ्यूज’ करता रहा।
बिहार की राजनीति को करीब से देख रहे सियासी पंडितों का कहना है कि बिहार की सियासत को समझना हर किसी के लिए आसान नहीं है। यहां क्या चल रहा है और आने वाले दिनों में राजनीति किस करवट बैठेगी, कहना मुश्किल है। लेकिन इन सारे घटनाक्रमों की लोकसभा चुनाव में बहुत अहम भूमिका होने वाली है। बिहार 2024 में गेम चेंजर हो सकता है।
भाजपा को इसकी भनक है। इसी को ध्यान में रखकर भाजपा अपनी रणनीति तैयार कर रही है। बाकी दल भी इसी परिप्रेक्ष्य में अपनी-अपनी तैयारी कर रहे हैं। प्रचार यह किया जा रहा है कि आने वाले संसदीय चुनाव के साथ ही नीतीशे कुमार राष्ट्रीय फलक पर आने वाले हैं।
वो आ भी सकते हैं। व्यापक अनुभव है। प्रदेश की राजनीति केसाथ राष्ट्रीय का भी। ऐसे में बिहार की सियासत काफी रोचक हो जाएगी। बीते दो लोकसभा चुनाव में बिहार कापरिणाम मोदी के पक्ष में एकतरफा रहा है। लेकिन अब परिस्थितियां अलग हैं। जदयू से गठबंधन टूटने के बाद बिहार में भाजपा को नए तरीके से अपनी रणनीति तैयार करनी होगी।
नीतीश- तेजस्वी को काउंटर करने के लिए भाजपा को एक मजबूत नेता की जरूरत महसूस हो रही है। यही भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती है। बल्कि यहां भाजपा विफल रही है। भाजपा का वोट प्रतिशत नीतीश और तेजस्वी के वोट प्रतिशत से काफी कम रहा है। दूसरा रोचक सवाल यह है कि क्या सीबीआई छापों का बिहार की सियासत पर कोई खास असर होगा, जवाब न में दिखता है। लालू प्रसाद यादव पर लगभग डेढ़ दशक पहले जांच बैठी, छापे पड़े और जेल गए। लेकिन राजद का वोट प्रतिशत प्रभावित नहीं हुआ। राजद के पास अपना समर्पित वोटर है। तब से अब तक, हालात में ज्यादा बदलाव नहीं है। देखना यह होगा कि सीबीआई किस तरह से सबूत सामने लेकर आती है। वैसे भी जब तक ताजा मामले में भ्रष्टाचार के सबूत अगर मिलते हैं तो चुनाव आ जाएगा। अब सवाल यह है कि ऐसे छापों से और उनके नतीजों से जनता कंफ्यूजियाए नहीं तो क्या करे।