न्यूज़ डेस्क: बीजेपी (BJP) और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के रिश्तों में कम ही समय पर छत्तीस का आंकड़ा देखा गया है। पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से समता पार्टी मजबूती से बीजेपी की पुरानी सहयोगी के तौर पर कदमताल करती रही है। हालांकि कुछ मुद्दों पर दोनों दलों के बीच तीखी तकरार भी देखे गए है। लेकिन जब कभी-भी चुनावी फसल काटने की बारी आई तो दोनों दलों ने भारी सूझबूझ का संदेश दिया है। इसी कड़ी में यूपी चुनाव को भी देखा जा रहा है।
बीजेपी और नीतीश में कुछ मुद्दों पर मतभेद
आपको बता दें कि हाल ही में बीजेपी ने जनसंख्या नियंत्रण कानून का मुद्दा उछाला तो नीतीश ने विरोधी दलों के सुर में सुर मिलाते हुए विरोध का झंडा बुलंद किया है। साथ ही बीजेपी को घेरने के लिये जातीय जनगणना पर पछाड़ने की भरसक कोशिश भी की है। इसके वाबजूद दोनों दलों के बीच की कैमिस्ट्री गजब की है।
यूपी चुनाव से पहले बीजेपी हुई सजग
यहां यह बताना जरुरी है कि उत्तरप्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने है। बीजेपी यूपी में सत्ता बरकरार रखने के लिये पूरी तैयारी शुरु कर दी है। इसी कड़ी में पार्टी राज्य में छोटे दलों को साधने के साथ-साथ जेडीयू को अपने पाला में कवायद तेज कर दी है। माना जा रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव में बिहार के सीएम नीतीश कुमार उत्तरप्रदेश के समर में योगी आदित्यनाथ के लिये वोट मांगते हुए देखे जा सकते है। इसके लिये बीजेपी और जेडीयू लगातार पटकथा तैयार करने में जुट गई है। जहां जेडीयू उत्तरप्रदेश में अपनी पार्टी को विस्तार करने का मन बना चुकी है। तो बीजेपी मुकेश सहनी की पार्टी से ज्यादा नीतीश को तरजीह देने के संकेत जानबूझकर दिया है।
छोटे दलों पर बीजेपी की पैनी नजर
वहीं बीजेपी बिहार से हम पार्टी को भी यूपी चुनाव के पिच पर खेलने के लिये सीमित मौका देने के पक्ष में है। इसकी एक बानगी तब देखी गई जब संतोष मांझी पीएम नरेंद्र मोदी से अकेले में चालीस मिनट मुलाकात की थी। दूसरी तरफ नीतीश की पैनी नजर उत्तरप्रदेश में यादव वोट बैंक की ही तरह कुर्मी समाज के वोट बैंक पर है। जो राज्य में सत्ता के समीकरण में फिट बैठती है। बीजेपी इस समाज से ही यूपी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाये हुए है। यहीं नहीं अनुप्रिया पटेल को भी बीजेपी महत्व देकर मोदी मंत्रीमंडल में शामिल कर लिया है। ताकि यह मजबूत वोट बैंक किसी न किसी तौर पर पार्टी को मजबूती प्रदान करें। पूर्वांचल के 16 जिलों में कुर्मी समाज की धाक कायम है। जिस पर नीतीश कुमार अपना हक जताना चाहता है। कारण वे खुद भी देश में कुर्मी नेता के तौर पर जाने जाते है।
योगी का प्रतिष्ठा लगा दांव पर
खैर यह तय है कि जाति जनगणना हो या जनसंख्या नियंत्रण कानून अगले यूपी विधानसभा चुनाव में सभी दलों के लिये प्रिय से भी ज्यादा सुविधा मुताबिक राजनीति का हिस्सा होने जा रहा है। फिर वो बीजेपी हो या जेडीयू,सपा,कांग्रेस सभी दल अपने-अपने राजनीतिक वोट बैंक को साधने के लिये कभी ठंडे बस्ते में डालेंगे तो कभी बोतल से बाहर लाकर राजनीतिक भूचाल पैदा करेंगे। जिससे वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में किया जा सकें।







